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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 147

मैं कैसी करूँ, मोहिं कछू ना भाये।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: maiṁ kaisī karūṁ? mohiṁ kachhū nā bhāye

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मैं कैसी करूँ, मोहिं कछू ना भाये।

2पिय आवन, मनभावन, पावन, दृग सावन-ऋतु लाये।

3रहि रहि हूक उठति हिय सजनी! प्राण कंठ चलि आये।

4उचकि, चौंकि, चकि, जकि सब यामिनि, भामिनि जागि बिताये।

5ऋतु-बसंत, शुक, पिक, केकी धुनि, उलटो मोहिं तड़पाये।

6कब “कृपालु” मोहिं रसिक शिरोमणि, कर गहि कंठ लगाये॥

हिन्दी भावार्थ

प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में एक विरहिणी कहती है कि मैं क्या उपाय करूँ। प्रियतम के बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उनके मधुर-मिलन का रसास्वादन करने के लिए मेरी आँखों ने आँसुओं की झड़ी लगा रखी है। अरी सखी! थोड़ी-थोड़ी देर में मेरे हृदय में बार-बार हूक-सी उठा करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो अब प्राण निकलना ही चाहते हैं। मैं सारी रात कभी उचकती हूँ, कभी चौंककर बैठ जाती हूँ एवं कभी कुछ बकने लगती हूँ। इस प्रकार सारी रात जागकर ही बिता देती हूँ। मुझे बसंत ऋतु के दृश्य एवं तोता, कोयल तथा मोरों की ध्वनि भी अत्यन्त व्याकुल बना देती है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब रसिक शिरोमणि प्यारे श्यामसुन्दर मेरा स्वयं हाथ पकड़कर मुझे अपने गले से लगायेंगे?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 829-830