विरह-माधुरी · पद 146
मुझ विरहिनि को विरह सतावे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mujha virahini ko viraha satāve
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मुझ विरहिनि को विरह सतावे।
2विपति हमारी सुनु री सहेली!, पिय बिनु छिनहूँ चैन न आवे।
3ज्यों जलहीन मीन तन तलफे, त्यों पिय बिनु पल कलप बिहावे।
4प्रियतम प्राणनाथ मग जोहत, निशि-दिन नैनहुँ नीर बहावे।
5कोउ तो हाय! दया करि सजनी!, सुंदर-श्याम सों आनि मिलावे।
6आवें न आवें अरि! पिय सों कोउ, मुझ विरहिनि की विथा सुनावे।
7लोक रीति समुझावु"कृपालुहिं", अंतहुँ कंत तो कंठ लगावे॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखी! मुझे प्रियतम का वियोग अत्यन्त ही दुःखदायी हो गया है। तू ही मेरी विपत्ति को सुन! प्रियतम के बिना मुझे एक क्षण के लिए भी कहीं चैन नहीं मिलता। जिस प्रकार जल के बिना मछली तड़पती है, उसी प्रकार प्रियतम के बिना मुझे भी एक-एक क्षण कल्प के समान लग रहा है। प्राणेश्वर श्यामसुन्दर की प्रतीक्षा करती हुई मेरी आँखें निरन्तर ही आँसू बहाती रहती हैं। हाय! हाय!! कोई भी तो दया करके मुझे मेरे प्यारे श्यामसुन्दर से मिला दे। यदि वह न आ सकें तो कम से बता दे। 'कृपालु' कहते हैं कि कोई जाकर उनको यह सांसारिक नियम ही समझा दे कि अब मेरे प्राण निकल रहे हैं। विदाई के समय लोक में भी प्रियजन अवश्य मिलते हैं, इस समय तो लोक-रीति के अनुसार ही एक बार मेरे प्रियतम मुझसे मिल लें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 828-829