# मुझ विरहिनि को विरह सतावे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0897-M19-K146
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 146
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 417–417

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मुझ विरहिनि को विरह सतावे।  
<a id="line-2"></a>विपति हमारी सुनु री सहेली!, पिय बिनु छिनहूँ चैन न आवे।  
<a id="line-3"></a>ज्यों जलहीन मीन तन तलफे, त्यों पिय बिनु पल कलप बिहावे।  
<a id="line-4"></a>प्रियतम प्राणनाथ मग जोहत, निशि-दिन नैनहुँ नीर बहावे।  
<a id="line-5"></a>कोउ तो हाय! दया करि सजनी!, सुंदर-श्याम सों आनि मिलावे।  
<a id="line-6"></a>आवें न आवें अरि! पिय सों कोउ, मुझ विरहिनि की विथा सुनावे।  
<a id="line-7"></a>लोक रीति समुझावु"कृपालुहिं", अंतहुँ कंत तो कंठ लगावे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखी! मुझे प्रियतम का वियोग अत्यन्त ही दुःखदायी हो गया है। तू ही मेरी विपत्ति को सुन! प्रियतम के बिना मुझे एक क्षण के लिए भी कहीं चैन नहीं मिलता। जिस प्रकार जल के बिना मछली तड़पती है, उसी प्रकार प्रियतम के बिना मुझे भी एक-एक क्षण कल्प के समान लग रहा है। प्राणेश्वर श्यामसुन्दर की प्रतीक्षा करती हुई मेरी आँखें निरन्तर ही आँसू बहाती रहती हैं। हाय! हाय!! कोई भी तो दया करके मुझे मेरे प्यारे श्यामसुन्दर से मिला दे। यदि वह न आ सकें तो कम से बता दे। 'कृपालु' कहते हैं कि कोई जाकर उनको यह सांसारिक नियम ही समझा दे कि अब मेरे प्राण निकल रहे हैं। विदाई के समय लोक में भी प्रियजन अवश्य मिलते हैं, इस समय तो लोक-रीति के अनुसार ही एक बार मेरे प्रियतम मुझसे मिल लें।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 828-829

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
