विरह-माधुरी · पद 145
माधो! हम मानत आभार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! hama mānata ābhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधो! हम मानत आभार।
2रहिहौं ऋणी तिहारो युग युग, जो किय मम उपकार।
3साँचो सखा श्यामसुंदर तुम, तीनिहुँ लोक मझार।
4अब लौं हौं नहिं जानत रह यह, तुमहिं ब्रह्म करतार।
5गोपिन ज्ञान देन मिस मो कहँ, दियो प्रेम उपहार।
6हार “कृपालु” जीत भइ मोरी, ज्ञानिन! करहु विचार॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेमरस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि तुम्हारे कृतज्ञ हैं। तुमने जो हमारा इतना महान् उपकार किया है उसका मैं युग-युग तक ऋणी रहूँगा। हे श्यामसुन्दर! त्रैलोक्य में तुम्हीं एक सच्चे सखा हो। मैं अब तक यह नहीं जानता था कि तुम्हीं ब्रह्म हो। गोपियों को ज्ञान देने के बहाने तुमने हमें प्रेमदान दे दिया। 'कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि अरे ज्ञानियों! तुम लोग थोड़ा गम्भीर विचार करो। मेरी हार भी जीत हो गयी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 827-828