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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 144

माधो! मोहिं लूटीं ब्रजनार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! mohiṁ lūṭīṁ brajanāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! मोहिं लूटीं ब्रजनार।

2पोथी पत्रा छोरि छारि मम, दियो बनाय लबार।

3लै निरुपाधि समाधि बहायो, प्रेम पयोधि मझार।

4निर्गुन ध्यान भुलाय, दियो मोहिं, ध्यान सगुन साकार।

5छोरि जोग मोहिं भोग सिखायो, तुम सँग नंदकुमार।

6जब “कृपालु” लिय लूटि सबै तब, कस न बहे जलधार॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेमरस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि ब्रज गोपियों ने मुझे लूट लिया। मेरे ज्ञान सम्बन्धी पोथी पत्रा को छीन कर मुझे लबरा सिद्ध कर दिया। मेरी निरूपाधि समाधि को लेकर प्रेम समुद्र में बहा दिया। मेरे निर्गुण ज्ञान को भुलाकर सगुण साकार भगवान का ध्यान दे दिया। मेरे योग को छीन कर तुम्हारे साथ दिव्य विहार करने की शिक्षा दे दी। 'कृपालु' कहते हैं कि जब तुम्हारा सर्वस्व लुट गया तब भला आँखों से अश्रुधारा क्यों न निकले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 827