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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 143

माधो! मोहिं पठयो वोहि देस।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! mohiṁ paṭhayo vohi desha

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! मोहिं पठयो वोहि देस।

2जहँ बैकुण्ठ नाथ अधाँगिनि, कमलाहूँ न प्रवेश।

3जहँ नहिं त्रिगुणमई माया को, हो निवेश लवलेश।

4जहँ नित फिरैं धरे गोपी तनु, भोलेनाथ महेश।

5जहँ नित गोपी-पद-रज याचत, विधिहुँ भिखारिहिं भेष।

6जहँ “कृपालु” ठाढ़े बनि तरुवर, सनकादिक योगेश॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेमरस परिप्लुत उद्धव अपने सखा श्यामसुन्दर से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुमने मुझे ऐसे देश में भेज दिया जहाँ महाविष्णु की श्रीमती महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं हैं। जहाँ त्रिगुणमयी माया का थोड़ा भी स्पर्श नहीं है। जहाँ भोले बाबा भगवान् शंकर गोपी तन धारण किये हुए घूमा करते हैं। जहाँ ब्रह्मा भिखारी बन कर उन गोपियों की चरणधूलि माँगा करते हैं। "'कृपालु' कहते हैं कि जहाँ सनकादिक योगीश्वर वृक्ष बन कर खड़े हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 826