लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 142

माधो! मानि लई हम हार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! māni laī hama hāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! मानि लई हम हार।

2जो जनतेउँ प्रथमहिं नहिं जातेउँ, ज्ञान देन ब्रजनार।

3तुम मोहिं जानि जानि तहँ पठयेहु, धन्य छलिन सरदार।

4भयो ज्ञान बदनाम इतै उत, मिली उपाधि"लबार"।

5दीन ज्ञान कहँ भार डार अब, जान प्रेम ही सार।

6अब “कृपालु” बरबस इन नैनन, बहत प्रेम जलधार॥

हिन्दी भावार्थ

गत रस सराबोर उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! मैंने अपनी हार मान ली। जो मैं प्रथम ही ऐसा जान लेता तो गोपियों को ज्ञान देने ही न जाता। तुमने मुझे जानबूझ कर वहाँ भेजा है। तुम सरीखे कपटी मित्रों को धन्य है। एक ओर तो ज्ञान कलंकित हुआ एवं दूसरी ओर मुझे लबार'की उपाधि मिली। मैने भी अब प्रेम को ही सार समझ कर ज्ञान आदि को भाड़ में डाल दिया है। 'कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि अब तो इन आँखों से अपने-आप ही प्रेमाश्रु बहते रहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 825-826