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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 141

माधो! भल पठयो संदेश।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! bhala paṭhayo sandesha

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! भल पठयो संदेश।

2दुर्यो ज्ञान तिमि लखि सखियन को, दिव्य प्रेम सविशेष।

3जिमि ह्वै जात चंद्र छूमंतर, प्रकटत भोर दिनेश।

4बरबस भयो विभोर प्रेमबस, सुधि न रही लवलेश।

5भरि भरि अंक लतन भेंटत रह, कहि कहि"हा प्राणेश!"।

6को “कृपालु” हरि! समुझि सकै तव, लीला नटवर भेष॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस विभोर उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुमने हमें अच्छा सन्देशा देने को भेजा। मेरा ज्ञान तो गोपियों के दिव्य सविशेष प्रेम को देख कर उसी प्रकार अलक्षित हो गया जिस प्रकार सूर्योदय होने पर चन्द्रमा नहीं दिखाई पड़ता। मैं हठात् प्रेमरस में विभोर हो गया। अपनी सुधि बुधि खो बैठा। लताओं को भेंटकर "हा! प्राणेश्वर! ऐसा कह कर उन्मत्त की भाँति कई दिन तक विचरता रहा। कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! नट के समान तुम्हारी अटपटी लीला को कोई नहीं समझ सकता।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 825