# माधो! भल पठयो संदेश।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0892-M19-K141
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 141
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 415–415

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>माधो! भल पठयो संदेश।  
<a id="line-2"></a>दुर्यो ज्ञान तिमि लखि सखियन को, दिव्य प्रेम सविशेष।  
<a id="line-3"></a>जिमि ह्वै जात चंद्र छूमंतर, प्रकटत भोर दिनेश।  
<a id="line-4"></a>बरबस भयो विभोर प्रेमबस, सुधि न रही लवलेश।  
<a id="line-5"></a>भरि भरि अंक लतन भेंटत रह, कहि कहि"हा प्राणेश!"।  
<a id="line-6"></a>को “कृपालु” हरि! समुझि सकै तव, लीला नटवर भेष॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस विभोर उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुमने हमें अच्छा सन्देशा देने को भेजा। मेरा ज्ञान तो गोपियों के दिव्य सविशेष प्रेम को देख कर उसी प्रकार अलक्षित हो गया जिस प्रकार सूर्योदय होने पर चन्द्रमा नहीं दिखाई पड़ता। मैं हठात् प्रेमरस में विभोर हो गया। अपनी सुधि बुधि खो बैठा। लताओं को भेंटकर "हा! प्राणेश्वर! ऐसा कह कर उन्मत्त की भाँति कई दिन तक विचरता रहा। कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! नट के समान तुम्हारी अटपटी लीला को कोई नहीं समझ सकता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 825

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
