विरह-माधुरी · पद 140
माधो! पुरवहु मम अभिलास।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! puravahu mama abhilāsa
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधो! पुरवहु मम अभिलास।
2राधा-सहचरि-चरण-रेणु उड़ि, कबहुँ परै तनु आस।
3वृंदावन की लता पता बनि, कब पैहौं तहँ वास।
4धनि बनचरिन, संग जिन विहरत, तजि वैकुण्ठ विलास।
5जेहि रस कहँ चारिहुँ श्रुति खोजत, सो रस गोपिन पास।
6सोऽहं,"वह हम"से “कृपालु” भये, दासोऽहं,"हम दास"॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम रस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! मेरी इस कामना को पूर्ण कीजिये। मैं वृन्दावन की लता पता बनकर, वहाँ इस आशा से कब निवास करूँगा कि कभी किशोरी जी की सहचरियों की चरण धूलि उड़कर मेरे भी शरीर पर पड़ जाय, जिससे मैं पवित्र हो जाऊँ। इन बनचरियों को धन्य है जिनके साथ बैकुण्ठनाथ अपने बैकुण्ठ के विलास को छोड़ कर नित्य विहार करते है। जिस रस को चारों वेद अभी तक खोज रहे हैं, वह रस इन्हीं गोपियों के पास है। 'कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि मैं तो सोऽहं 'मैं ब्रह्म ही हूँ, इस सिद्धांत को छोड़कर 'दासोऽहं 'मैं दास हूँ श्यामसुन्दर हमारे स्वामी हैं, इस द्वैत भक्ति सिद्धांत का अनुयायी हो गया हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 824