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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 139

माधो! धन्य धन्य ब्रजनार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! dhanya dhanya brajanāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! धन्य धन्य ब्रजनार।

2जिनके रोम रोम उरझानो, सगुण ब्रह्म साकार।

3सात्विक भाव आठहूँ इनके, प्रकटत नित इकसार।

4सहज समाधि सदा इन सब की, गयों देखि बलिहार।

5इनहिं चेतनाचेतन सब जग, दीखत नंदकुमार।

6कब “कृपालु” हम लता विटप बनि, चरणधूरि सिर धार॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेमरस विभोर ज्ञानी उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि इन ब्रजगोपियों को धन्य है, जिनके रोम-रोम में सगुण साकार ब्रह्म समाये हुए हैं इनके शरीर में आठों सात्विक भाव एक साथ प्रकट होते हैं। अनायास, बिना प्रयास के ही इनकी समाधि लग जाती है। मैं तो देखकर नलिहार गया। इनको समस्त जड़ चेतन स्वरूप संसार श्यामसुन्दर स्वरूप ही दीखता र। 'कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि लता वृक्ष बनकर हम भी इनकी चरण धूलि को अपने सिर पर कब धारण करेंगे?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 823-824