विरह-माधुरी · पद 138
माधो! तुम मोहिं भले पठाये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! tuma mohiṁ bhale paṭhāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधो! तुम मोहिं भले पठाये।
2ब्रज बनितनि के बनन गये गुरु, चेला बनि हम आये।
3ज्ञान देन पठयो सो ज्ञानहुँ, प्रेम पयोधि बहाये।
4नाम रूप मिथ्या कहि आपुहिं, नाम रूप गुन गाये।
5गये ज्ञान नीरस लै, पी रस, प्रेम सुधा बौराये।
6पै “कृपालु” तुम ज्ञान योग को, बड़ उपहास कराये॥
हिन्दी भावार्थ
हल रस विभोर उद्धव श्यामसुन्दर से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर तुमने हमें ज्ञान देने के लिये खूब भेजा! हम तो ब्रज गोपियों के गुरु बनने गये थे किन्तु चेला बनकर लौटे हैं। तुमने हमें जिस ज्ञान को गोपियों को प्रदान करने के लिये भेजा था वह ज्ञान तो उनके प्रेमसिन्धु में वह गया। नाम रूप मिथ्या है'इस सिद्धांत को अपने आप प्रतिपादित करते हुए भी स्वयं नाम, रूप, गुण गाने लगे। नीरस ज्ञान लेकर गये थे किन्तु प्रेमामृत रस पीकर पागल होकर लौटे। कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव! यह सब तो ठीक है किन्तु बडे दुःख की बात है कि तुमने ज्ञान एवं योग की बहुत बड़ी हँसी करा दी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 822-823