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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 137

माधो! तुम पूरे ठगहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! tuma pūre ṭhagahāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! तुम पूरे ठगहार।

2ठग्यो मोहिं नहिं मरम बतायो, स्वयं सिद्ध ब्रजनार।

3शुष्क पत्र जिमि ज्ञान बह्यो मम, प्रेम नदी मझधार।

4बन्यो वियोगी रस बस बरबस, जोग सिखावन हार।

5प्रेम वियोगिनि हैं नित योगिनि, अब समझ्यो यह सार।

6अस ठगहार “कृपालु” मिलहिं जेहि, हौं तापर बलिहार॥

हिन्दी भावार्थ

उद्वव जी श्यामसुन्दर से कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! तुम बहुत बड़े कपटी हो। तुमने मेरे साथ भी कपट किया क्योंकि यह गुप्त रहस्य नहीं बताया कि गोपियाँ नित्यसिद्ध महापुरुष हैं। हमारा ज्ञान उनकी प्रेम की नदी की धारा में सूखे हुए पत्ते की भाँति वह गया। मैं योग सिखाने वाला बरबस प्रेम विभोर होकर वियोगी बन गया। प्रेम के वियोगी नित्य योगी रहते हैं यह रहस्य मैंने अब समझा। कृपालु' कहते हैं कि हे उद्धव! तुम्हारे सखा सरीखे कपटी जिसको मिल जायं मैं उस पर बलिहार जाता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 822