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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 136

माधो! जाउँ तुमहिं बलिहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! jāuṁ tumahiṁ balihāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1माधो! जाउँ तुमहिं बलिहार।

2पठयो जहँ उपदेसन तहँ सब, नित्य सिद्ध ब्रजनार।

3ब्रजवासिनि गोलोक निवासिनि, प्रकटीं लै अवतार।

4ब्रजनारिनि की विरह अगिनि परि, ज्ञान भयो जरि छार।

5तुम मोते सब भेद दुरायो, धन्य सखा व्यवहार।

6याही धर्म “कृपालु” सखा को, जो किय नंदकुमार॥

हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस में सने हुए उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि अरे श्यामसुन्दर! मैं तुम्हारी लीलाओं पर बार-बार बलिहार जाता हूँ। तुमने हमें ऐसे स्थान में ज्ञान के उपदेश के लिए भेजा, जहाँ की समस्त ब्रजबनिंतायें अनादिकाल से सिद्ध हैं। ये सब ब्रजगोपियाँ गोलोक से अवतार ले लेकर प्रकट हुई हैं। हे सखे! ब्रजगोपियों की विरहाग्नि में पड़ कर मेस ज्ञान भस्मसात् हो गया। तुमने मुझसे यह सब रहस्य छिपाया। क्या यही मित्र का कर्तव्य है? 'कृपालु' कहते हैं हे उद्धव! जो तुम्हारे सखा ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया, वही प्रत्येक सखा को करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें नीरस से सरस बना दिया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 821