# माधो! जाउँ तुमहिं बलिहार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0887-M19-K136
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 136
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 413–413

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>माधो! जाउँ तुमहिं बलिहार।  
<a id="line-2"></a>पठयो जहँ उपदेसन तहँ सब, नित्य सिद्ध ब्रजनार।  
<a id="line-3"></a>ब्रजवासिनि गोलोक निवासिनि, प्रकटीं लै अवतार।  
<a id="line-4"></a>ब्रजनारिनि की विरह अगिनि परि, ज्ञान भयो जरि छार।  
<a id="line-5"></a>तुम मोते सब भेद दुरायो, धन्य सखा व्यवहार।  
<a id="line-6"></a>याही धर्म “कृपालु” सखा को, जो किय नंदकुमार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम रस में सने हुए उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि अरे श्यामसुन्दर! मैं तुम्हारी लीलाओं पर बार-बार बलिहार जाता हूँ। तुमने हमें ऐसे स्थान में ज्ञान के उपदेश के लिए भेजा, जहाँ की समस्त ब्रजबनिंतायें अनादिकाल से सिद्ध हैं। ये सब ब्रजगोपियाँ गोलोक से अवतार ले लेकर प्रकट हुई हैं। हे सखे! ब्रजगोपियों की विरहाग्नि में पड़ कर मेस ज्ञान भस्मसात् हो गया। तुमने मुझसे यह सब रहस्य छिपाया। क्या यही मित्र का कर्तव्य है? 'कृपालु' कहते हैं हे उद्धव! जो तुम्हारे सखा ने तुम्हारे साथ व्यवहार किया, वही प्रत्येक सखा को करना चाहिये; क्योंकि तुम्हें नीरस से सरस बना दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 821

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
