विरह-माधुरी · पद 135
माधो! गये देन भल ज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādho! gaye dena bhala gyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधो! गये देन भल ज्ञान।
2खोयो ज्ञान न सोच, सोच यह, निज सुधि बुधिहुँ भुलान।
3गयो ज्ञान अज्ञान दोउ मम, ह्वै गयो बस कल्यान।
4सरबस लै बरबस मोहिं दीनी, विरह वेदना दान।
5हिय बिच हाय! हूक सी हूलति, निकसत चह जनु प्रान।
6अब “कृपालु” आगे का करिहौ, दो बताय भगवान॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम रस दीवाने उद्धव माधव से कहते हैं कि हे माधव! हम अच्छा ज्ञान देने गये। मैंने अपना ज्ञान खो दिया इसकी विशेष चिन्ता नहीं, किन्तु चिन्ता तो यह है कि मैं अपनी सुधि-बुधि भी खो बैठा। मेरा आज्ञान एवं ज्ञान दोनों ही समाप्त हो गया, अधिक क्या कहूँ, बस कल्याण हो गया व सब प्रकार से बण्टाढार हो गया। मेरा सर्वस्व लेकर मुझे एक विरह वेदना की महाव्याधि ऊपर से दे दी। अब तो मेरे हृदय में हूक सी उठती है। मानो प्राण निकलना ही चाहते हैं। हे भगवान्! अब तो बता दो कि आगे और क्या करोगे?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 820-821