विरह-माधुरी · पद 134
माधव!, अब न, तुमहिं पतियाउँ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādhava! aba na, tumahiṁ patiyāuṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधव!, अब न, तुमहिं पतियाउँ।
2हँसी कराय कहा तुम पायेहु, पठइ मोहिं अस गाउँ।
3अब जो पठवहु कबहुँ कतहुँ तो, हौं न भूलिहूँ जाउँ।
4उनके रोम रोम मनमोहन, नाहिं ज्ञान को ठाउँ।
5अपनेहिं सखहिं हराय धरायेहु, आपुहिं आपन नाउँ।
6तुम “कृपालु” काहुहिं नहिं छोड़त, केतिक नाउँ गिनाउँ॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम रस विभोर उद्धव अपने सखा से कहते हैं कि अब मैं तुम्हारा कभी भी विश्वास न करूँगा। तुमने मुझे ऐसे गाँव में भेज कर मेरी अच्छी खिल्ली उड्वाई। भला तुम्हें क्या मिल गया? अब आगर तुम मुझे कभी भी, कहीं भेजोगे तो मैं भूलकर भी नहीं जाऊँगा। इन गोपियों के रोम-रोम में तुम बसे हो। ज्ञान के लिये वहाँ स्थान ही नहीं है। तुमने अपने सखा को गोपियों से हरवा कर अपने-आप अपने नाम पर बट्टा लगाया है। 'कृपालु' के शब्दों में उद्धव कहते हैं कि तुम किसी को छोड़ने वाले नहीं हो, मैं कितने नाम गिनाऊँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 819-820