विरह-माधुरी · पद 133
मन भावन सावन आय रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: manabhāvana sāvana āya re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मन भावन सावन आय रे।
2घनन घनन घन गरजि तरजि सखि! मोहिं विरहिनि डरपाय रे।
3चम चम चम चम चमकि चमकि जनु, चपला मोहिं चिढ़ाय रे।
4पिउ पिउ कहि पापी पपिहा सखि! जनु मोहिं जरिहिं जराय रे।
5कोकिल कूकि कूकि कलकंठहिं, जनु कटु वचन सुनाय रे।
6नाचि नाचि चहुँ ओर मोर गन, जनु तनु सुधि बिसराय रे।
7जो “कृपालु” पिय आय जायँ तो, जाँय सबै खिसियाय रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी सखी कहती है कि मन को लुभाने वाला सावन का महीना आ गया, किन्तु प्रियतम नहीं आये। सखि! देख, तो बादल गरज-गरजकर मुझ विरहिणी को डरा रहे हैं। निजली चमक-चमककर मानो मुझे चिढ़ा रही है। पापी पपीहा "पिउ पिउ'कह-कहकर मानो मुझ जली को और जला रहा है। कोयल मधुर ध्वनि से कूक-कूककर मानो व्यंग्य वचन सुना रही हैं। चारों ओर मोरगण नाच-नाचकर मानो मेरी सुधि-बुधि भुला रहे हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि अगर ऐसे समय में प्रियतम आ जायँ तो सब के सब खिसिया जायँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 819