# मन भावन सावन आय रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0884-M19-K133
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 133
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 412–412

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मन भावन सावन आय रे।  
<a id="line-2"></a>घनन घनन घन गरजि तरजि सखि! मोहिं विरहिनि डरपाय रे।  
<a id="line-3"></a>चम चम चम चम चमकि चमकि जनु, चपला मोहिं चिढ़ाय रे।  
<a id="line-4"></a>पिउ पिउ कहि पापी पपिहा सखि! जनु मोहिं जरिहिं जराय रे।  
<a id="line-5"></a>कोकिल कूकि कूकि कलकंठहिं, जनु कटु वचन सुनाय रे।  
<a id="line-6"></a>नाचि नाचि चहुँ ओर मोर गन, जनु तनु सुधि बिसराय रे।  
<a id="line-7"></a>जो “कृपालु” पिय आय जायँ तो, जाँय सबै खिसियाय रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी सखी कहती है कि मन को लुभाने वाला सावन का महीना आ गया, किन्तु प्रियतम नहीं आये। सखि! देख, तो बादल गरज-गरजकर मुझ विरहिणी को डरा रहे हैं। निजली चमक-चमककर मानो मुझे चिढ़ा रही है। पापी पपीहा "पिउ पिउ'कह-कहकर मानो मुझ जली को और जला रहा है। कोयल मधुर ध्वनि से कूक-कूककर मानो व्यंग्य वचन सुना रही हैं। चारों ओर मोरगण नाच-नाचकर मानो मेरी सुधि-बुधि भुला रहे हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि अगर ऐसे समय में प्रियतम आ जायँ तो सब के सब खिसिया जायँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 819

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
