विरह-माधुरी · पद 132
भ्रमर! तू, वृथा करत मनुहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhramara! tū, vrithā karata manuhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भ्रमर! तू, वृथा करत मनुहार।
2जानि गई हौं भली-भाँति तोहिं, मिठबोलनो लबार।
3कपटपुरी बनि गई मधुपुरी, बसत सबै ठगहार।
4मृषा वदत सब वेद ब्रह्म को, करुणा को भंडार।
5प्रेमनगर को लूटि बनायो, कपटिन को चटसार।
6अब “कृपालु” लै जाहु और कहुँ, खोलहु कपट बजार॥
हिन्दी भावार्थ
( श्रीवृषभानुनन्दिनी राधिकाजी अपने चरणों पर गुनगुनाते हुए भौरे को देखकर दिव्य उन्माद की अवस्था में रा से बात करती हुई श्यामसुन्दर का निमित्त लेकर उसे फटकारती हैं। राधिकाजी समझती हैं कि इस भौरे को छलिया श्यामसुन्दर ने मेरे पास मजाने को भेजा है।) अरे भौरे! तू व्यर्थ ही छलिया श्यामसुन्दर की आज्ञानुसार मुझे मजाने का प्रयत्न कर रहा है। मैं तुझे अच्छी प्रकार समझ चुकी हूँ कि तू केवल मीठी-मीठी बातें ही बनाना जानता है वास्तविकता कुछ भी नहीं है। मथुरा तो श्यामसुन्दर के पहुँचते ही कपट को नगरी बन गई है एवं उस नगरी में कपटी लोग ही निवास करते हैं। श्यामसुन्दर को वेदों ने झूठे ही दया का सागर बताया है। उस कपरी ने तो प्रेमनगर को लूटकर उसे कपट का विद्यालय बना डाला है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे भौरे! अब तू और कहीं जाकर अपने कपट का व्यापार कर, मैं तेरे कपट में नहीं आ सकती। तेरा तथा उस छलिया का स्वरूप तथा कार्य एक-सा ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 818