विरह-माधुरी · पद 131
भ्रमर! तू, जनि गुन-गुन गुंजार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhramara! tū, jani guna-guna guñjāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भ्रमर! तू, जनि गुन-गुन गुंजार।
2मधुर-बैन मन कपट-कतरनी, लोटत चरन मझार।
3एक सुमन तजि अपर सुमन सों, छिन छिन करत विहार।
4जा हरजाई सौतन गुन-गन, गाइ करिय मनुहार।
5जस राजा तस प्रजा मधुपुरी, सबै कपट व्यवहार।
6अब न लागिहैं राउरि माया, कीजै यतन हजार।
7अंध “कृपालु” विचारि धरत पग, लगे ठेह इक बार॥
हिन्दी भावार्थ
(किशोरी जी अपने चरणों पर गुंजारते हुए भौरे को देखकर दिव्य उन्माद की अवस्था में, श्रीकृष्ण को संकेत करके भौरे से कहती हैं।) अरे भौरे! तू गुन-गुन की मधुर गुँजार मत कर। तू मुख से तो मधुर बोलता है किन्तु मन में कपट-कतरनी को लिए हुए मुझे ठगने के निमित्त मेरे चरणों पर लोट रहा है। अरे भौरे! मैं भली भाँति जानती हूँ तू एक पुष्प को छोड़कर दूसरे पुष्प पर एवं दूसरे पुष्प को छोड़कर तीसरे पुष्प पर, इसी प्रकार एक-एक को छोड़ता हुआ दूसरे दूसरे पुष्प पर विहार किया करता है। अरे हरजाई! अर्थात् अनेक से प्रेम करने वाले भौरे, मेरे सामने से हट जा एवं जिन प्रियतम के गुणगान तू अपनी ध्वनि में मुझे सुना रहा है, उसे जाकर कुब्जा आदि को सुनाकर उन्हें प्रसन्न कर। मथुरा में जैसा राजा है वैसी ही प्रजा भी है। अर्थात् श्यामसुन्दर की तरह तेस भी व्यवहार कपटमय ही है किन्तु अब तू चाहे कितने ही उपाय क्यों न करे, मुझे ठग नहीं सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे भौरे! अन्धा भी एक बार ठोकर लग जाने पर फिर बड़ी ही सावधानी से पैर रखता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 817