# भ्रमर! तू, जनि गुन-गुन गुंजार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0882-M19-K131
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 131
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 411–411

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भ्रमर! तू, जनि गुन-गुन गुंजार।  
<a id="line-2"></a>मधुर-बैन मन कपट-कतरनी, लोटत चरन मझार।  
<a id="line-3"></a>एक सुमन तजि अपर सुमन सों, छिन छिन करत विहार।  
<a id="line-4"></a>जा हरजाई सौतन गुन-गन, गाइ करिय मनुहार।  
<a id="line-5"></a>जस राजा तस प्रजा मधुपुरी, सबै कपट व्यवहार।  
<a id="line-6"></a>अब न लागिहैं राउरि माया, कीजै यतन हजार।  
<a id="line-7"></a>अंध “कृपालु” विचारि धरत पग, लगे ठेह इक बार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी अपने चरणों पर गुंजारते हुए भौरे को देखकर दिव्य उन्माद की अवस्था में, श्रीकृष्ण को संकेत करके भौरे से कहती हैं।) अरे भौरे! तू गुन-गुन की मधुर गुँजार मत कर। तू मुख से तो मधुर बोलता है किन्तु मन में कपट-कतरनी को लिए हुए मुझे ठगने के निमित्त मेरे चरणों पर लोट रहा है। अरे भौरे! मैं भली भाँति जानती हूँ तू एक पुष्प को छोड़कर दूसरे पुष्प पर एवं दूसरे पुष्प को छोड़कर तीसरे पुष्प पर, इसी प्रकार एक-एक को छोड़ता हुआ दूसरे दूसरे पुष्प पर विहार किया करता है। अरे हरजाई! अर्थात् अनेक से प्रेम करने वाले भौरे, मेरे सामने से हट जा एवं जिन प्रियतम के गुणगान तू अपनी ध्वनि में मुझे सुना रहा है, उसे जाकर कुब्जा आदि को सुनाकर उन्हें प्रसन्न कर। मथुरा में जैसा राजा है वैसी ही प्रजा भी है। अर्थात् श्यामसुन्दर की तरह तेस भी व्यवहार कपटमय ही है किन्तु अब तू चाहे कितने ही उपाय क्यों न करे, मुझे ठग नहीं सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि अरे भौरे! अन्धा भी एक बार ठोकर लग जाने पर फिर बड़ी ही सावधानी से पैर रखता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 817

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
