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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 130

भयो सखि!, अब सो सुख सपनो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhayo sakhi! aba so sukha sapano

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भयो सखि!, अब सो सुख सपनो।

2हरि अक्रूर क्रूर हरि लै गयो, अब जग को अपनो।

3कहँ लौ करिय सहाय हाय! अब, श्याम नाम जपनो।

4अब तो विरह दवानल महँ नित, है हम कहँ तपनो।

5अब तनु राखि कहा करनो सखि! विरह विथा खपनो।

6कह “कृपालु” यह विरह जानु सखि! खरो प्रेम-नपनो॥

हिन्दी भावार्थ

मथुरा-गमन के पश्चात् श्यामसुन्दर के वियोग में ब्रज-बालाओं का विलाप-) अरी सखि! अब तो वह सुख सपना हो गया। वह क्रूर अक्रूर श्यामसुन्दर को बरबस ले गया। अब इस संसार में अपना कौन है? अरी सखि! श्याम नाम जपना-मात्र कब तक सहायक होगा? अब तो हम लोगों को श्यामसुन्दर की विरहाग्नि में ही निरन्तर जलना है। अरी सखि! मेरे विचार से तो श्यामसुन्दर के बिना इस शरीर का रखना व्यर्थ है। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! प्रियतम का वियोग ही प्रेमिका के लिये सच्चा प्रेम सम्बन्धी मापक दंड है। अर्थात् यदि विरह में भी प्रियतम की रुचि मानकर सहर्ष शरीर धारण किये रहे, तभी वह सच्ची प्रेयसी सिद्ध होती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 816