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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 129

भये द्वै दिन के, कै ह्वै हाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhaye dvai dina ke, kai hvai hāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1भये द्वै दिन के, कै ह्वै हाय।

2वा कुब्जा ने ना जाने का, बूटी वाय खवाय।

3आय न सो बलभाय हाय अरु, पातिहुँ नाहिं पठाय।

4सहि न जाय यह विरह दुसह-दुख, प्रानहुँ तजि नहिं जाय।

5मन कह तन ते चल मथुरा पै, बुधि कह प्रेम नसाय।

6कह “कृपालु” मन-बुधि धरि हरि पद, तनु ते कर्म सुहाय॥

हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के वियोग में ब्रजदेवियों की दयनीय दशा) हाय सखि! श्यामसुन्दर दो दिन में आने के लिये कह गये थे, किन्तु कितने दिन हो गये, नहीं आये उस कुब्जा ने न जाने कौन सी बूटी खिला दी है कि आना तो दूर रहा, पत्र तक नहीं भेजा। एक ओर तो प्रियतम के विरह का असह्य दुःख सहा नहीं जाता, दूसरी ओर प्राण भी नहीं छोड़ा जाता। मन शरीर से कहता है कि मथुरा चलो; किन्तु बुद्धि कहती है प्रिम की रुचि के विपरीत आचरण करने से प्रेम नष्ट हो जायगा। कृपालु कहते हैं अरी सखि! मन-बुद्धि को श्यामसुन्दर के चरणों में रखकर शरीर से कर्म कर। यही कर्म-योग जीवों के लिये आदर्श बन जायेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 815-816