विरह-माधुरी · पद 128
बैरी बसंत, सखी! पुनि आयो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bairī basanta, sakhī! puni āyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बैरी बसंत, सखी! पुनि आयो।
2अंतक प्रानन अंत करन चह, निगुरिहिं कुबरिहिं कंत लुभायो।
3पल्लव लाल रसाल साल उर, सरसों फूलि झूलि इठलायो।
4कुसुम-कदंबनि भौंरनि अंबनि, बौरन लखि सखि! मन बौरायो।
5शीतल-मंद-सुगंध पवन जनु, विरहिनि विरह अगिनि धधकायो।
6ताहू पै “कृपालु” पुनि कोकिल, कूकि-कूकि मोहिं जरिहिं जरायो॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! फिर आ गया। यमराज प्राणों का ग्राहक बन गया है और उधर श्यामसुन्दर उस निगोड़ी कुबड़ी में मुग्ध हो गये हैं।! आम के नये-नये लाल-लाल पत्ते हृदय में साल रहे हैं उधर सरसों भी फूली हुई, हवा में झूमती हुई, इठला रही है। कदम्ब के फूलों पर गुनगुनाते हुए भौरों के झुण्ड एवं आम के बौरों को देखकर तो मन बिल्कुल ही पागल हो गया है। शीतल मंद-सुगन्धित वायु भी मानो विरहिणी की विरहाग्नि को प्रज्ज्चलित करने में सहायक हो रहा है। हैं-इस पर भी कोयल कूक-कूक कर मुझ जली को और भी जला रही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 814-815