विरह-माधुरी · पद 127
बेदरदी! क्यों इतनो इतरात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bedaradī! kyoṁ itano itarāta?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बेदरदी! क्यों इतनो इतरात।
2टुक हँसि हेरु ओर मम निर्मम!, कहा तोर घटि जात।
3दृग सहाय घर पाय हाय! हिय, अब उनहिंन सों घात।
4सरबस लूटि, लगाय आग घर, अबहूँ नाहिं अघात।
5प्राण कंठगत कछु पल परखत, देखि दृगन बरसात।
6क्यों “कृपालु” पिय! क्रूर कहावत, बड़ अपयश लघु बात॥
हिन्दी भावार्थ
उ विरहिणी कहती है कि हे निष्ठुर! मुझे अपनी बना अब इतना क्यों इतरा रहा है? अरे निर्मोही! मैं और कुछ नहीं चाहती, केवल थोड़ा-सा हँसकर मेरी ओर निहार ले। इतना करने से तेरा क्या घट जायगा? अरे! जिन आँखों के द्वारा तूने मेरे हृदय में स्थान पाया था, अब तू उन्हीं आँखों को तड्पाता हुआ उनसे विश्वासघात कर रहा है। क्या मेरा सर्वस्व लूट लेने पर एवं हृदय रूपी घर में आग लगा देने पर भी, अभी तेरा पेट नहीं भरा? मेरी आँखों को रोते हुए देखकर उन्हीं के निमित्त मेरे प्राण कंठ तक आकर भी कुछ देर तेरी और भी प्रतीक्षा कर रहे हैं अन्यथा अब तक प्राण निकल गये होते। 'कृपालु'प्यारे श्यामसुन्दर को समझाते हुए कहते हैं कि हे प्यारे प्रियतम! तुम अकारण करुण हो फिर निष्ठुर क्यों कहलाना चाहते हो? अगर कहीं विरहिणी का प्राण निकल गया तो छोटी सी बात के लिये तुम्हारे माथे पर कलंक का टीका लग जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 813-814