# बेदरदी! क्यों इतनो इतरात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0878-M19-K127
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 127
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 409–409

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बेदरदी! क्यों इतनो इतरात।  
<a id="line-2"></a>टुक हँसि हेरु ओर मम निर्मम!, कहा तोर घटि जात।  
<a id="line-3"></a>दृग सहाय घर पाय हाय! हिय, अब उनहिंन सों घात।  
<a id="line-4"></a>सरबस लूटि, लगाय आग घर, अबहूँ नाहिं अघात।  
<a id="line-5"></a>प्राण कंठगत कछु पल परखत, देखि दृगन बरसात।  
<a id="line-6"></a>क्यों “कृपालु” पिय! क्रूर कहावत, बड़ अपयश लघु बात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

उ विरहिणी कहती है कि हे निष्ठुर! मुझे अपनी बना अब इतना क्यों इतरा रहा है? अरे निर्मोही! मैं और कुछ नहीं चाहती, केवल थोड़ा-सा हँसकर मेरी ओर निहार ले। इतना करने से तेरा क्या घट जायगा? अरे! जिन आँखों के द्वारा तूने मेरे हृदय में स्थान पाया था, अब तू उन्हीं आँखों को तड्पाता हुआ उनसे विश्वासघात कर रहा है। क्या मेरा सर्वस्व लूट लेने पर एवं हृदय रूपी घर में आग लगा देने पर भी, अभी तेरा पेट नहीं भरा? मेरी आँखों को रोते हुए देखकर उन्हीं के निमित्त मेरे प्राण कंठ तक आकर भी कुछ देर तेरी और भी प्रतीक्षा कर रहे हैं अन्यथा अब तक प्राण निकल गये होते। 'कृपालु'प्यारे श्यामसुन्दर को समझाते हुए कहते हैं कि हे प्यारे प्रियतम! तुम अकारण करुण हो फिर निष्ठुर क्यों कहलाना चाहते हो? अगर कहीं विरहिणी का प्राण निकल गया तो छोटी सी बात के लिये तुम्हारे माथे पर कलंक का टीका लग जायगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 813-814

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
