विरह-माधुरी · पद 126
वीर! हौं, धरौं कौन विधि धीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vīra! hauṁ, dharauṁ kauna vidhi dhīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वीर! हौं, धरौं कौन विधि धीर।
2जिन सँग छिन-छिन रही रैन-दिन, विहरत प्रेम-अधीर।
3तिनके परसन की का कहिये, दुर्लभ दरसन वीर!।
4भई चूक वा दिन जा दिन सखि!, लख्यो भ्रात बलवीर।
5हौं सपनेहुँ नहिं सोचि सकी अस, ह्वैहैं पिय बेपीर।
6कह “कृपालु” यह नहिं अचरज सखि, जाति प्रभाव अहीर॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! श्यामसुन्दर के वियोग में मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूँ? जिन प्रियतम के साथ प्रेम विभोर होकर दिन-रात प्रतिक्षण दिव्य विहार करती थी, उनके स्पर्श को तो कौन कहे, दर्शन भी दुर्लभ हो गये। अरी सखि! भूल तो मुझसे उसी दिन हो गयी जिस दिन भूले से श्यामसुन्दर को देखा। मैं स्वप्न में भी नहीं सोचती थी कि श्यामसुन्दर इतने निष्ठुर हो जायेंगे। इतने में "कृपालु 'ने कहा अरी सखि! यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है, यह तो अहीर जाति की निष्ठुरता का प्रमाण लोक विख्यात है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 813