# वीर! हौं, धरौं कौन विधि धीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0877-M19-K126
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 126
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 409–409

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>वीर! हौं, धरौं कौन विधि धीर।  
<a id="line-2"></a>जिन सँग छिन-छिन रही रैन-दिन, विहरत प्रेम-अधीर।  
<a id="line-3"></a>तिनके परसन की का कहिये, दुर्लभ दरसन वीर!।  
<a id="line-4"></a>भई चूक वा दिन जा दिन सखि!, लख्यो भ्रात बलवीर।  
<a id="line-5"></a>हौं सपनेहुँ नहिं सोचि सकी अस, ह्वैहैं पिय बेपीर।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” यह नहिं अचरज सखि, जाति प्रभाव अहीर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! श्यामसुन्दर के वियोग में मैं किस प्रकार धैर्य धारण करूँ? जिन प्रियतम के साथ प्रेम विभोर होकर दिन-रात प्रतिक्षण दिव्य विहार करती थी, उनके स्पर्श को तो कौन कहे, दर्शन भी दुर्लभ हो गये। अरी सखि! भूल तो मुझसे उसी दिन हो गयी जिस दिन भूले से श्यामसुन्दर को देखा। मैं स्वप्न में भी नहीं सोचती थी कि श्यामसुन्दर इतने निष्ठुर हो जायेंगे। इतने में "कृपालु 'ने कहा अरी सखि! यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है, यह तो अहीर जाति की निष्ठुरता का प्रमाण लोक विख्यात है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 813

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
