विरह-माधुरी · पद 125
बार इक, आओ प्राणाधार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bāra ika, āo prāṇādhāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बार इक, आओ प्राणाधार।
2अब तुम को कोउ ग्वाल न कहिहैं, कहिहैं राजकुमार।
3राधा-कृष्ण नाम तजि कहिहैं, कुब्जा-कृष्ण पुकार।
4"वासुदेव"कहि टेरिहैं अब, नहिं, कहिहैं"नंद कुमार"।
5ब्रजवासी सब"महाराज", कहि, करहिं पुष्प-बौछार।
6चढ़ि “कृपालु” सिहांसन आओ, लें हम प्रजा निहार॥
हिन्दी भावार्थ
(ब्रजगोपियाँ प्यारे श्यामसुन्दर के मथुरा चले जाने के बाद विरह-व्याकुल होकर कहती हैं।) हे प्राणाधार श्यामसुन्दर! एक बार तो आ जाओ (यदि तुम्हें यह भय हो कि हमसे गोपियाँ पूर्व की भाँति ही प्रेमपूर्वक धृष्टतापूर्ण व्यवहार करेंगी, जैसा कि सदा करती आई हैं, तो हम सब विश्वास दिलाती हैं कि अब ऐसा न होगा।) अब तुमको हम लोगों में से कोई भी 'ग्वाल'नहीं कहेंगी वरन् सब लोग 'राजकुमार'कहा करेंगी, एवं 'राधा-कृष्ण'नाम को पुकार छोड़कर 'कुब्जा-कृष्ण! की पुकार किया करेंगी। हे श्यामसुन्दर! अब तुमको कोई भी 'नन्दकुमार'नहीं कहेगी वरन् सब लोग वासुदेव कहा करेंगी। समस्त ब्रजवासी अब तुमको "महाराज 'कहकर पुष्पों की वर्षा किया करेंगे।"कृपालु कहते हैं कि यदि प्रियतम के नाते न आ सको तो "सम्राट'के नाते ही सिंहासन पर बैठकर एक बार आ जाओ एवं हम सब प्रजा के अधिकार से ही तुम्हें जी भरकर देख लेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 812