लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 124

बलि जाउँ कपट चटसार की।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali jāuṁ kapaṭa chaṭasāra kī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1बलि जाउँ कपट चटसार की।

2जहँ राजा भये छलिन-शिरोमणि, प्रजा कपट आगार की।

3जहाँ बिकति कुल कानि आनि सब, अति भोरी ब्रजनार की।

4जहाँ लूटि वैराग सिखावत, धनि सो निलज लबार की।

5जहँ तन, मन अरु प्रान हरन करि, अरपत पीर अपार की।

6जहँ “कृपालु” अस होति ठगोरी, बात बनावत प्यार की॥

हिन्दी भावार्थ

(त्रज-गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम की विनोदमयी निन्दा करती हुई उनके वियोग में उद्धव से कहती हैं।) हम उसे कपट के महाविद्यालय की बलिहार जाती हैं जहाँ कपटियों के सरदार प्रधान-अध्यापक-रूप सम्राट हैं एवं जिनके पढ़ाये हुए शिष्य-रूपी प्रजावर्ग भी कपट के भण्डार स्वरूप हैं। जिस राज्य में अत्यन्त ही भोली-भाली ब्रज-गोपियों की कुल की मर्यादाएँ निका करती हैं एवं जहाँ पर तन मन, प्राण सर्वस्व लूटकर उन्हें योग, वैराग्य सिखाया जाता है। ऐसे निर्लज्ज एवं लबरा सम्राट को धन्य है, जहाँ पर ब्रज गोपियों का हरण करके उन्हें असह्य विरह-वेदना प्रदान की ह (लूट) हुआ करती है, वहाँ भी प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें बनाई जाती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 811-812