विरह-माधुरी · पद 123
बताओ सखि!, कैसे धरूँ मैं धीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: batāo sakhi! kaise dharūṁ maiṁ dhīra?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बताओ सखि!, कैसे धरूँ मैं धीर।
2जो रातें पल सम मधु बातें, करत बीत गइँ वीर।
3वे अब पल पल कटन न मानो, द्रुपद सुता की चीर।
4जिन अँखियन जल नेकहुँ आवत, पिय रह होत अधीर।
5तिन अँखियन सों सदा एकरस, बहत रहत अब नीर।
6जिनते होत पलकहूँ न्यारे, उठत रही उर पीर।
7सुनति “कृपालु” कहानी उनकी,"थे कोउ श्याम शरीर"॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखि! तू ही बता कि मैं धैर्य किस प्रकार से धरूँ। अरी मखी! प्रियतम श्यामसुन्दर के साथ मधुर-मधुर बातें करते हुए जो राते उस समय एक क्षण के समान व्यतीत हो जाया करती धी, उन्हीं रात्रियों का आज एक-एक पल भी काटे नहीं कटता। अह रात द्रौपदी के चीर के समान बढ़ती ही जाती है। मेरी जिन ह थे, उन्हीं आँखों से अब निरन्तर एक-तार आँसू नहते रहते हैं। जिन श्यामसुन्दर से एक क्षण के लिए भी पृथक होने पर मेरे हृदय में असह्य पीड़ा हुआ करती थी, 'कृपालु' कहते हैं कि आज उन्हीं श्यामसुन्दर की कहानी-मात्र सुना करती हूँ कि ब्रज में कभी कोई श्यामसुन्दर थे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 810-811