विरह-माधुरी · पद 122
प्राण हित, पावस-ग्रीषम धायो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prāṇa hita, pāvasa-grīshama dhāyo
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्राण हित, पावस-ग्रीषम धायो।
2ग्रीषम वरषा होड़ परी अब, प्रलय काल चलि आयो।
3इत तो अति प्रदीप्त-विरहानल, सब तन आग लगायो।
4उत दोउ नैन-बलाहक जल लै, निशि-दिन ही बरसायो।
5प्रथम नाथ! ज्यों पिये दवानल, दुखियन प्राण बचायो।
6पिउ “कृपालु” त्यों पिउ विरहानल, प्राण कंठ चलि आयो॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी कहती है कि वर्षा एवं ग्रीष्म ऋतुओं के झगड़े में हमारा प्राण अब नहीं बच सकता। ऐसा प्रतीत होता गण कि ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में परस्पर होड़ लग गई है, ऐसी ही अवस्था को वेद-पुराण प्रलयकाल कहते हैं। एक ओर तो अत्यन्त प्रदीप्त विरह की आग मेरे समस्त शरीर को जला रही है, दूसरी ओर नेत्र रूपी बादल जल लेकर निरन्तर ही वर्षा कर रहे हैं। हे नाथ! जिस प्रकार आपने द्वापर में ब्रज-वासियों के प्राण बचाने के लिए दावानल का पान किया था, उसी प्रकार कृपालु' कहते हैं कि मेरे विरहानल का भी पान कर लीजिए अन्यथा मेरे प्राण अब निकलना ही चाहते हैं। विरहानल के समाप्त होने पर वर्षा स्वयं ही समाप्त हो जायगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 809-810