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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 121

पुनि शरत-पूर्णिमा आ गई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: puni sharata-pūrṇimā ā gaī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पुनि शरत-पूर्णिमा आ गई।

2कौन प्रीत की रीत मीत की, बीत अरी वरषा गई।

3नहिं आये नहिं हमहिं बुलाये, अस कुबरी मन भा गई।

4जो किय पिय! अपमान सदा तव, सो फल हम भल पा गई।

5दे दो क्षमादान अब हम कहँ, बानि क्षमा की का गई।

6कह “कृपालु” यह शरत-रास सुधि, औरहुँ आग लगा गई॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक गोपांगना कहती है-अरी सखि! देख तो शरद्पूणिमा भी आ गयी। अरी सखि! वर्षा ऋतु भी बीत गयी। यह प्रियतम की कौन सी प्रीति की रीति है, जो न स्वयं आये न तो हम लोगों को ही बुलाया। क्या कुब्जा में इतनी आसक्ति हो गयी है? नहीं! नहीं! यह बात नहीं है। हे प्रियतम श्यामसुन्दर! हमने अनजाने में तुम्हारा जो बार-बार अपमान किया था उसी का फल हम भोग रही हैं किन्तु उसकी भी सीमा हो गयी। अब हम लोगों को क्षमा कर दो। क्या आपकी अनादिकालीन क्षमा को बानि समाप्त हो गयी है? 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! यह शरदपूर्णिमा के महारास की स्मृति विरह की हृदयस्थ आग को और भी अधिक प्रज्ज्वलित कर गयी है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 808-809