विरह-माधुरी · पद 120
पिरोवति राधा अँसुवन हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pirovati rādhā aṁsuvana hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पिरोवति राधा अँसुवन हार।
2रटति चातकी सरिस निरंतर, पिवु! पिवु प्राणाधार।
3भूषन, असन, बसन, नहिं भावत, कृश-तनु विरह अपार।
4जड़ जंगम सब सों नित पूछति,"तुम देखे रिझवार?"।
5कबहुँक लता, विटप भरि भेंटत, करि करि सुरति विहार।
6होति “कृपालु” छिनहिं छिन मुर्छित, सखिन करति उपचार॥
हिन्दी भावार्थ
श्रीराधा-प्यारी, प्यारे श्यामसुन्दर के वियोग में आँसुओं की माला-सी गूँथ रही हैं विरहिणी चातकी के समान प्रतिक्षण पिउ। पिउ! हा प्राणाधार!! की रटना लगा रही हैं। उन्हें भोजन स्त्र एवं गहने आदि कुछ भी अच्छे नहीं लगते। प्यारे श्यामसुन्दर के असह्य वियोग में उनका गौर शरीर अत्यन्त ही दुर्बल हो गया है। वे विरह-व्याकुल होकर स्थावर, जंगम अर्थात् लता क्ष, पशु पक्षियों आदि से पूछती फिरती हैं कि क्या तुमने हीं मेरे प्यारे श्यामसुन्दर को देखा है? कभी पागल सी बन ऋर पूर्व की लीला-विहार-स्थलियों में जा-जाकर एवं पूर्व विहार का स्मरण करके लताओं, वृक्षों आदि का आलिंगन करती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि तत्पश्चात् किशोरी जी बार बार मूर्च्छित हो जाती हैं एवं ललिता आदि सखियाँ उनकी विविध प्रकार की चिकित्साएँ करती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 808