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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 119

पिय बिनु, प्यारी गइ बौराय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya binu, pyārī gai baurāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिय बिनु, प्यारी गइ बौराय।

2ऋतु बसंत कहँ कंत जानि कह,"हँसि हँसि प्रियतम आय"।

3तरु तमाल पर, अति रसाल जो, कोकिल कूक सुनाय।

4तेहि कह,"देखु आम्र तरु बैठो, मोहन मोहिं बुलाय"।

5झलकत आम्रबौर पकरति कहि,"पीतांबर फहराय"।

6ता पर लखि अलि अवलि कहति,"लखु, लट कारी लहराय"।

7पल्लव लाल “कृपालु” लाल पग, लाली लखि लपटाय॥

हिन्दी भावार्थ

र एक विरहिणी श्यामसुन्दर के वियोग में पागल हो गयी है। उसकी दशा को व्यक्त करती हुई दूसरी सखी कहती है कि "अरी सखि! तू तो पागल हो गयी है''। वह सखी कहती है '"नहीं-नहीं देख तो प्रियतम आ गये ''। सखी कहती है "यह तो वसन्त ऋतु है''। इस पर विरहिणी कहती है कि देख-देख आम के पेड़ पर बैठे हुए प्रियतम मुझे बुला रहे हैं"'। सखी कहती है '"यह प्रियतम नहीं कोयल कूक रही है''। इस पर विरहिणी कहती है कि ''अरी सखि! देख उनका पीताम्बर फहरा रहा है''। सखि कहती है ''यह पीताम्बर नहीं यह तो पीले रंग का आम का बौर है''। विरहिणी कहती है ''अरी सखि! देख, तो यह काली-काली उनकी लटें लहरा रही हैं ''। सखी कहती है ''अरे यह तो आम के बौर के ऊपर भौरों के झुण्ड मँडरा रहे हैं''। 'कृपालु' कहते हैं कि वह विरहिणी आम के नये पत्तों को श्यामसुन्दर के चरणों की लालिमा समझकर उनसे बार-बार लिपट रही है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 806