# पिय बिनु, प्यारी गइ बौराय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0870-M19-K119
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 119
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 406–406

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिय बिनु, प्यारी गइ बौराय।  
<a id="line-2"></a>ऋतु बसंत कहँ कंत जानि कह,"हँसि हँसि प्रियतम आय"।  
<a id="line-3"></a>तरु तमाल पर, अति रसाल जो, कोकिल कूक सुनाय।  
<a id="line-4"></a>तेहि कह,"देखु आम्र तरु बैठो, मोहन मोहिं बुलाय"।  
<a id="line-5"></a>झलकत आम्रबौर पकरति कहि,"पीतांबर फहराय"।  
<a id="line-6"></a>ता पर लखि अलि अवलि कहति,"लखु, लट कारी लहराय"।  
<a id="line-7"></a>पल्लव लाल “कृपालु” लाल पग, लाली लखि लपटाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

र एक विरहिणी श्यामसुन्दर के वियोग में पागल हो गयी है। उसकी दशा को व्यक्त करती हुई दूसरी सखी कहती है कि "अरी सखि! तू तो पागल हो गयी है''। वह सखी कहती है '"नहीं-नहीं देख तो प्रियतम आ गये ''। सखी कहती है "यह तो वसन्त ऋतु है''। इस पर विरहिणी कहती है कि देख-देख आम के पेड़ पर बैठे हुए प्रियतम मुझे बुला रहे हैं"'। सखी कहती है '"यह प्रियतम नहीं कोयल कूक रही है''। इस पर विरहिणी कहती है कि ''अरी सखि! देख उनका पीताम्बर फहरा रहा है''। सखि कहती है ''यह पीताम्बर नहीं यह तो पीले रंग का आम का बौर है''। विरहिणी कहती है ''अरी सखि! देख, तो यह काली-काली उनकी लटें लहरा रही हैं ''। सखी कहती है ''अरे यह तो आम के बौर के ऊपर भौरों के झुण्ड मँडरा रहे हैं''। 'कृपालु' कहते हैं कि वह विरहिणी आम के नये पत्तों को श्यामसुन्दर के चरणों की लालिमा समझकर उनसे बार-बार लिपट रही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 806

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
