विरह-माधुरी · पद 118
पिय बिनु, मो कहँ कछु न सुहाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya binu, mo kahaṁ kachhu na suhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पिय बिनु, मो कहँ कछु न सुहाय।
2नैन निगोरे, नातहिं जोरे, इन्द्रिन लिये मिलाय।
3शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गँधहिं, इंद्रिन पिय मन भाय।
4लखि इंद्रिन रस-सागर नागर, मनहूँ मिलि गयो जाय।
5इंद्रिन, मन बौरात देखि, बुधि, आपु गई बौराय।
6प्रान पयान करन चह जब ही, बरजत सब मिलि धाय।
7इक “कृपालु” को संग दियो बस, हाय! हाय! बस हाय!॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता। इन हठीले नेत्रों ने बिना समझे-बूझे ही प्रियतम की रूप माधुरी में फँसकर उनसे अपना मधुर सम्बन्ध स्थापित कर लिया; एवं कान, नासिका रसना, त्वचा आदि ज्ञानेन्द्रियों को भी अपने पक्ष में कर लिया है। अब ये पाचों इन्द्रियाँ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन समस्त विषयों से प्रियतम को ही चाहती हैं। समस्त इन्द्रियो को प्रियतम के ही रस में निमग्न देखकर मन भी जाकर उन्हीं से मिल गया है। इन्द्रियों एवं मन को इस प्रकार बौराते हुए देखकर बुद्धि भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी अर्थात् वह उसी पक्ष में हो गई। अब अकेला प्राण जैसे ही शरीर से निकलना चाहता है वैसे ही इन्द्रिय, मन, बुद्धि सभी आकर उसे बरबस रोक देती हैं, अर्थात् सब की सलाह होती है कि प्रियतम के मिलने की आशा रखो। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझ विरहिणी का संग "हाय! हाय!!'से युक्त आहों ने ही दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 805