# पिय बिनु, मो कहँ कछु न सुहाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0869-M19-K118
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 118
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 405–406

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिय बिनु, मो कहँ कछु न सुहाय।  
<a id="line-2"></a>नैन निगोरे, नातहिं जोरे, इन्द्रिन लिये मिलाय।  
<a id="line-3"></a>शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गँधहिं, इंद्रिन पिय मन भाय।  
<a id="line-4"></a>लखि इंद्रिन रस-सागर नागर, मनहूँ मिलि गयो जाय।  
<a id="line-5"></a>इंद्रिन, मन बौरात देखि, बुधि, आपु गई बौराय।  
<a id="line-6"></a>प्रान पयान करन चह जब ही, बरजत सब मिलि धाय।  
<a id="line-7"></a>इक “कृपालु” को संग दियो बस, हाय! हाय! बस हाय!॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता। इन हठीले नेत्रों ने बिना समझे-बूझे ही प्रियतम की रूप माधुरी में फँसकर उनसे अपना मधुर सम्बन्ध स्थापित कर लिया; एवं कान, नासिका रसना, त्वचा आदि ज्ञानेन्द्रियों को भी अपने पक्ष में कर लिया है। अब ये पाचों इन्द्रियाँ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन समस्त विषयों से प्रियतम को ही चाहती हैं। समस्त इन्द्रियो को प्रियतम के ही रस में निमग्न देखकर मन भी जाकर उन्हीं से मिल गया है। इन्द्रियों एवं मन को इस प्रकार बौराते हुए देखकर बुद्धि भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी अर्थात् वह उसी पक्ष में हो गई। अब अकेला प्राण जैसे ही शरीर से निकलना चाहता है वैसे ही इन्द्रिय, मन, बुद्धि सभी आकर उसे बरबस रोक देती हैं, अर्थात् सब की सलाह होती है कि प्रियतम के मिलने की आशा रखो। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझ विरहिणी का संग "हाय! हाय!!'से युक्त आहों ने ही दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 805

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
