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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 117

पिय बिनु, कैसेहुँ जिय नहिं चैन।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya binu, kaisehuṁ jiya nahiṁ chaina

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिय बिनु, कैसेहुँ जिय नहिं चैन।

2दरस दिवाने अति मनमाने, ठाने हठ दोउ नैन।

3दृग बरसावत दिवस बितावत, तारे गिन गिन रैन।

4हिय सों निकसति हूक छिनहिं छिन, मुख सों पिवु पिवु बैन।

5कहँ लौं प्रीति दुराइय आली! हाथन चंद दुरै न।

6हौं “कृपालु” तोहिं प्रथमहिं बरज्यों, बचियो नैनन-सैन॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हाय! हाय!! मुझे तो प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना एक क्षण को भी चैन नहीं है। मेरी दोनों आँखें प्रियतम को देखने के लिए अत्यन्त हठीली बन गई हैं एवं मनमानी हो रही हैं। सारे दिन आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी रहती है एवं सारी रात तारों को गिन-गिनकर बिताती हूँ। हृदय से बार-बार हूक उठती रहती है एवं मुख से आहों से युक्त प्रियतम! प्रियतम!! की ध्वनि निकला करती है। अरी सखी! प्रेम को कहाँ तक छुपाऊँ, भला चन्द्रमा को भी कोई अपने हाथों से छुपा सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि उस अन्तरंग सखी ने कहा कि मैंने तो तुम्हें पहले ही रोका था कि श्यामसुन्दर के कटाक्षो से बची रहना, पर तुमने नहीं माना। अब तो यह सब होगा ही तथा तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 804