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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 116

पिय आवन कहि गये, आये ना।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piya āvana kahi gaye, āye nā

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पिय आवन कहि गये, आये ना।

2नहिं आये सो बात कछू नहिं, मोहूँ काहिं बुलाये ना।

3नाहिं बुलाये बात नहीं कछु, कछु संदेश पठाये ना।

4ऐसे श्याम भये निर्मोही, नैनन तपन बुझाये ना।

5अस जनतिउँ तो सब सों कहतिउँ, कोउ इन प्रीति लगाये ना।

6अब “कृपालु” पिय! आइय वेगिहिं, कछुक तोर घटि जाये ना॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! प्रियतम श्यामसुन्दर आने के लिए कह गये थे किन्तु न जाने क्यों नहीं आये। नहीं आये, इसका भी कोई पछतावा नहीं है किन्तु दुःख की बात तो यह है कि मुझको भी नहीं बुलाया। नहीं बुलाने का भी उतना दुःख नहीं है जितना इस बात का कि कोई संदेशा भी नहीं भेजा। श्यामसुन्दर बड़े ही निष्ठुर हो गये हैं; वे आँखों की तपन भी नहीं बुझाते। यदि मैं पहले से ऐसा जानती तो सबसे कह देती कि कोई इनसे ऐसा प्रेम न करना। 'कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम! अब तुम जल्दी आ जाओ, एक बार दर्शन देने में भला तुम्हारा क्या घट जायगा?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 803-804