विरह-माधुरी · पद 115
पपिहरा, पापी मोहिं सताय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: papiharā, pāpī mohiṁ satāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पपिहरा, पापी मोहिं सताय।
2हौं तो आपुहिं जरी विरह-दव, तू जनि मोहिं जराय।
3कल न परत मोहिं कैसेहुँ, इक पल, कलप समान बिताय।
4कहा बैर मोते अधरातिहिं, पी पी शब्द सुनाय।
5तू तो जानत सहत विरह-दुख, पुनि क्यों मोहिं तड़पाय।
6दै “कृपालु” अँगुरी रहु कानन, खल मन कछु न बसाय॥
हिन्दी भावार्थ
महा बैर मोते अधरातिहिँ, पी पी शब्द सुनाय। तो जानत सहत विरह-दुःख, पुनि क्यों मोहिं तड़पाय। कृपालु 'अँगुरी रहु कानन, खल सन कछु न बसाय। "विरहिणी पपीहे की बोली सुनकर उसे कोसती हुई कहती है कि अरे पापी पपीहरा! मैं तो अपने-आप ही विरह की आग में जल चुकी हूँ, फिर तू मुझे जलाकर और भी अधिक कष्ट क्यों देता है? मुझे तो अपने आप ही प्रियतम के बिना एक क्षण कल्प के समान बीत रहा है। अरे पपीहरा। मुझसे तेरा क्या बैर है? जो अधरात्रि में ही पी-पी बोल सुनाता है। तू भी तो स्वाती के बादलों के दुःसह-विरह के दुःख का अनुभव करता है, फिर उस दुःख को जानते हुए भी मुझे दुःखी करने से तुझे क्या मिलता है? 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू अपने दोनों कानों में अँगुली दे ले। संसार में दुष्टों के आगे किसी का कुछ भी बस नहीं चलता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 802-803