# पपिहरा, पापी मोहिं सताय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0866-M19-K115
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 115
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 404–404

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पपिहरा, पापी मोहिं सताय।  
<a id="line-2"></a>हौं तो आपुहिं जरी विरह-दव, तू जनि मोहिं जराय।  
<a id="line-3"></a>कल न परत मोहिं कैसेहुँ, इक पल, कलप समान बिताय।  
<a id="line-4"></a>कहा बैर मोते अधरातिहिं, पी पी शब्द सुनाय।  
<a id="line-5"></a>तू तो जानत सहत विरह-दुख, पुनि क्यों मोहिं तड़पाय।  
<a id="line-6"></a>दै “कृपालु” अँगुरी रहु कानन, खल मन कछु न बसाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

महा बैर मोते अधरातिहिँ, पी पी शब्द सुनाय। तो जानत सहत विरह-दुःख, पुनि क्यों मोहिं तड़पाय। कृपालु 'अँगुरी रहु कानन, खल सन कछु न बसाय। "विरहिणी पपीहे की बोली सुनकर उसे कोसती हुई कहती है कि अरे पापी पपीहरा! मैं तो अपने-आप ही विरह की आग में जल चुकी हूँ, फिर तू मुझे जलाकर और भी अधिक कष्ट क्यों देता है? मुझे तो अपने आप ही प्रियतम के बिना एक क्षण कल्प के समान बीत रहा है। अरे पपीहरा। मुझसे तेरा क्या बैर है? जो अधरात्रि में ही पी-पी बोल सुनाता है। तू भी तो स्वाती के बादलों के दुःसह-विरह के दुःख का अनुभव करता है, फिर उस दुःख को जानते हुए भी मुझे दुःखी करने से तुझे क्या मिलता है? 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू अपने दोनों कानों में अँगुली दे ले। संसार में दुष्टों के आगे किसी का कुछ भी बस नहीं चलता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 802-803

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
