# पिय बिनु, कैसेहुँ जिय नहिं चैन।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0868-M19-K117
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 117
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 405–405

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिय बिनु, कैसेहुँ जिय नहिं चैन।  
<a id="line-2"></a>दरस दिवाने अति मनमाने, ठाने हठ दोउ नैन।  
<a id="line-3"></a>दृग बरसावत दिवस बितावत, तारे गिन गिन रैन।  
<a id="line-4"></a>हिय सों निकसति हूक छिनहिं छिन, मुख सों पिवु पिवु बैन।  
<a id="line-5"></a>कहँ लौं प्रीति दुराइय आली! हाथन चंद दुरै न।  
<a id="line-6"></a>हौं “कृपालु” तोहिं प्रथमहिं बरज्यों, बचियो नैनन-सैन॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हाय! हाय!! मुझे तो प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना एक क्षण को भी चैन नहीं है। मेरी दोनों आँखें प्रियतम को देखने के लिए अत्यन्त हठीली बन गई हैं एवं मनमानी हो रही हैं। सारे दिन आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी रहती है एवं सारी रात तारों को गिन-गिनकर बिताती हूँ। हृदय से बार-बार हूक उठती रहती है एवं मुख से आहों से युक्त प्रियतम! प्रियतम!! की ध्वनि निकला करती है। अरी सखी! प्रेम को कहाँ तक छुपाऊँ, भला चन्द्रमा को भी कोई अपने हाथों से छुपा सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि उस अन्तरंग सखी ने कहा कि मैंने तो तुम्हें पहले ही रोका था कि श्यामसुन्दर के कटाक्षो से बची रहना, पर तुमने नहीं माना। अब तो यह सब होगा ही तथा तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 804

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
