# प्राण हित, पावस-ग्रीषम धायो।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0873-m19-k122/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0873-M19-K122
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 122
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 407–407

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0873-m19-k122/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=873&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0873-m19-k122.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>प्राण हित, पावस-ग्रीषम धायो।  
<a id="line-2"></a>ग्रीषम वरषा होड़ परी अब, प्रलय काल चलि आयो।  
<a id="line-3"></a>इत तो अति प्रदीप्त-विरहानल, सब तन आग लगायो।  
<a id="line-4"></a>उत दोउ नैन-बलाहक जल लै, निशि-दिन ही बरसायो।  
<a id="line-5"></a>प्रथम नाथ! ज्यों पिये दवानल, दुखियन प्राण बचायो।  
<a id="line-6"></a>पिउ “कृपालु” त्यों पिउ विरहानल, प्राण कंठ चलि आयो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

विरहिणी कहती है कि वर्षा एवं ग्रीष्म ऋतुओं के झगड़े में हमारा प्राण अब नहीं बच सकता। ऐसा प्रतीत होता गण कि ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में परस्पर होड़ लग गई है, ऐसी ही अवस्था को वेद-पुराण प्रलयकाल कहते हैं। एक ओर तो अत्यन्त प्रदीप्त विरह की आग मेरे समस्त शरीर को जला रही है, दूसरी ओर नेत्र रूपी बादल जल लेकर निरन्तर ही वर्षा कर रहे हैं। हे नाथ! जिस प्रकार आपने द्वापर में ब्रज-वासियों के प्राण बचाने के लिए दावानल का पान किया था, उसी प्रकार कृपालु' कहते हैं कि मेरे विरहानल का भी पान कर लीजिए अन्यथा मेरे प्राण अब निकलना ही चाहते हैं। विरहानल के समाप्त होने पर वर्षा स्वयं ही समाप्त हो जायगी।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 809-810

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0872-m19-k121/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0874-m19-k123/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
