# बताओ सखि!, कैसे धरूँ मैं धीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0874-M19-K123
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 123
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 407–408

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बताओ सखि!, कैसे धरूँ मैं धीर।  
<a id="line-2"></a>जो रातें पल सम मधु बातें, करत बीत गइँ वीर।  
<a id="line-3"></a>वे अब पल पल कटन न मानो, द्रुपद सुता की चीर।  
<a id="line-4"></a>जिन अँखियन जल नेकहुँ आवत, पिय रह होत अधीर।  
<a id="line-5"></a>तिन अँखियन सों सदा एकरस, बहत रहत अब नीर।  
<a id="line-6"></a>जिनते होत पलकहूँ न्यारे, उठत रही उर पीर।  
<a id="line-7"></a>सुनति “कृपालु” कहानी उनकी,"थे कोउ श्याम शरीर"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखि! तू ही बता कि मैं धैर्य किस प्रकार से धरूँ। अरी मखी! प्रियतम श्यामसुन्दर के साथ मधुर-मधुर बातें करते हुए जो राते उस समय एक क्षण के समान व्यतीत हो जाया करती धी, उन्हीं रात्रियों का आज एक-एक पल भी काटे नहीं कटता। अह रात द्रौपदी के चीर के समान बढ़ती ही जाती है। मेरी जिन ह थे, उन्हीं आँखों से अब निरन्तर एक-तार आँसू नहते रहते हैं। जिन श्यामसुन्दर से एक क्षण के लिए भी पृथक होने पर मेरे हृदय में असह्य पीड़ा हुआ करती थी, 'कृपालु' कहते हैं कि आज उन्हीं श्यामसुन्दर की कहानी-मात्र सुना करती हूँ कि ब्रज में कभी कोई श्यामसुन्दर थे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 810-811

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
