# बैरी बसंत, सखी! पुनि आयो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0879-M19-K128
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 128
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 410–410

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बैरी बसंत, सखी! पुनि आयो।  
<a id="line-2"></a>अंतक प्रानन अंत करन चह, निगुरिहिं कुबरिहिं कंत लुभायो।  
<a id="line-3"></a>पल्लव लाल रसाल साल उर, सरसों फूलि झूलि इठलायो।  
<a id="line-4"></a>कुसुम-कदंबनि भौंरनि अंबनि, बौरन लखि सखि! मन बौरायो।  
<a id="line-5"></a>शीतल-मंद-सुगंध पवन जनु, विरहिनि विरह अगिनि धधकायो।  
<a id="line-6"></a>ताहू पै “कृपालु” पुनि कोकिल, कूकि-कूकि मोहिं जरिहिं जरायो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! फिर आ गया। यमराज प्राणों का ग्राहक बन गया है और उधर श्यामसुन्दर उस निगोड़ी कुबड़ी में मुग्ध हो गये हैं।! आम के नये-नये लाल-लाल पत्ते हृदय में साल रहे हैं उधर सरसों भी फूली हुई, हवा में झूमती हुई, इठला रही है। कदम्ब के फूलों पर गुनगुनाते हुए भौरों के झुण्ड एवं आम के बौरों को देखकर तो मन बिल्कुल ही पागल हो गया है। शीतल मंद-सुगन्धित वायु भी मानो विरहिणी की विरहाग्नि को प्रज्ज्चलित करने में सहायक हो रहा है। हैं-इस पर भी कोयल कूक-कूक कर मुझ जली को और भी जला रही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 814-815

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
