# भये द्वै दिन के, कै ह्वै हाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0880-M19-K129
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 129
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 410–410

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भये द्वै दिन के, कै ह्वै हाय।  
<a id="line-2"></a>वा कुब्जा ने ना जाने का, बूटी वाय खवाय।  
<a id="line-3"></a>आय न सो बलभाय हाय अरु, पातिहुँ नाहिं पठाय।  
<a id="line-4"></a>सहि न जाय यह विरह दुसह-दुख, प्रानहुँ तजि नहिं जाय।  
<a id="line-5"></a>मन कह तन ते चल मथुरा पै, बुधि कह प्रेम नसाय।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” मन-बुधि धरि हरि पद, तनु ते कर्म सुहाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के वियोग में ब्रजदेवियों की दयनीय दशा) हाय सखि! श्यामसुन्दर दो दिन में आने के लिये कह गये थे, किन्तु कितने दिन हो गये, नहीं आये उस कुब्जा ने न जाने कौन सी बूटी खिला दी है कि आना तो दूर रहा, पत्र तक नहीं भेजा। एक ओर तो प्रियतम के विरह का असह्य दुःख सहा नहीं जाता, दूसरी ओर प्राण भी नहीं छोड़ा जाता। मन शरीर से कहता है कि मथुरा चलो; किन्तु बुद्धि कहती है प्रिम की रुचि के विपरीत आचरण करने से प्रेम नष्ट हो जायगा। कृपालु कहते हैं अरी सखि! मन-बुद्धि को श्यामसुन्दर के चरणों में रखकर शरीर से कर्म कर। यही कर्म-योग जीवों के लिये आदर्श बन जायेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 815-816

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
