# मैं कैसी करूँ, मोहिं कछू ना भाये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0898-M19-K147
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 147
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 418–418

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मैं कैसी करूँ, मोहिं कछू ना भाये।  
<a id="line-2"></a>पिय आवन, मनभावन, पावन, दृग सावन-ऋतु लाये।  
<a id="line-3"></a>रहि रहि हूक उठति हिय सजनी! प्राण कंठ चलि आये।  
<a id="line-4"></a>उचकि, चौंकि, चकि, जकि सब यामिनि, भामिनि जागि बिताये।  
<a id="line-5"></a>ऋतु-बसंत, शुक, पिक, केकी धुनि, उलटो मोहिं तड़पाये।  
<a id="line-6"></a>कब “कृपालु” मोहिं रसिक शिरोमणि, कर गहि कंठ लगाये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रियतम श्यामसुन्दर के वियोग में एक विरहिणी कहती है कि मैं क्या उपाय करूँ। प्रियतम के बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। उनके मधुर-मिलन का रसास्वादन करने के लिए मेरी आँखों ने आँसुओं की झड़ी लगा रखी है। अरी सखी! थोड़ी-थोड़ी देर में मेरे हृदय में बार-बार हूक-सी उठा करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो अब प्राण निकलना ही चाहते हैं। मैं सारी रात कभी उचकती हूँ, कभी चौंककर बैठ जाती हूँ एवं कभी कुछ बकने लगती हूँ। इस प्रकार सारी रात जागकर ही बिता देती हूँ। मुझे बसंत ऋतु के दृश्य एवं तोता, कोयल तथा मोरों की ध्वनि भी अत्यन्त व्याकुल बना देती है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब रसिक शिरोमणि प्यारे श्यामसुन्दर मेरा स्वयं हाथ पकड़कर मुझे अपने गले से लगायेंगे?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 829-830

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
