# मो सम कौन अभागिनि मात?।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0899-M19-K148
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 148
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 418–418

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मो सम कौन अभागिनि मात?।  
<a id="line-2"></a>जो प्राणाधिक श्याम-राम तजि, प्रान न तनु ते जात।  
<a id="line-3"></a>राम लखन तजि तज्यो प्रान जो, धनि सो दशरथ तात।  
<a id="line-4"></a>ऊखल-बंधन सरिस क्रूरता, करत रही दिन-रात।  
<a id="line-5"></a>कपट प्रेम लखि तज्यो लाल जो, नहिं अचरज की बात।  
<a id="line-6"></a>इमि “कृपालु” यशुमति अधीर ह्वै, मन ही मन पछतात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अपने लाला के वियोग में विह्ल मैया यशोदा कहती हैं कि मेरे समान इस संसार में कौन दूसरी भाग्यहीन माँ होगी जो श्री कृष्ण एवं बलराम को प्राण से भी अधिक प्रिय कहती हुई उनके वियोग में प्राण न छोड़ सकी। वे पिता राजा दशरथ अत्यन्त भाग्यशाली थे जिन्होंने राम लक्ष्मण के वियोग। में अपने प्रेम का परिचय देते हुए प्राण छोड़ दिये। हाय! मैं अपने लाला के साथ ऊखल बंधन सरीखा सदा कठोर व्यवहार। क्यों किया करती थी? कदाचित मेरे प्रेम को कपटयुक्त समझ कर ही मेरे लाला ने मेरा परित्याग कर दिया है। यदि ऐसा है तब ठीक ही है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार यशोदा जी अपने लाला के वियोग से अत्यन्त ही अधीर होकर मन ही मन में पछता रही हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 830

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
